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Showing posts from May, 2020

लल्लू

चलौ समैटो, झल्लू-पल्लू, तीस मार खां हैगौ लल्लू, अबई छुटपुटॉ थोरौ बाक़ी, है जावैगौ हल्लू-हल्लू, अपने मोंह ते गावत डोलें सबई कहें फिर कल्लू-कल्लू, बैय्यर ठी-ठी कर कें हंस रईं, मोंह पै धर साड़ी कौ पल्लू, अपईं इज्जत हाथ में अपने, इतै-बितै चों फिरें निठल्लू, उर्मिला माधव 23.5.2018

दुनियां हमारी

न तौ घर ई हमारौ न दुनियां हमारी, पतौ जे चलौ कै हमईं ए भिकारी, इमारत तौ अब लौं धरी जों की तों ऐं, कै सांसई अचानक चली गई बिचारी, हबाके भरे जिन्ने दुनियां में ऊंचे, बेऊ मर कैं कित्ते भये भारी-भारी, जि निश्चित है सब कूँ ई मरनौ पडैगौ, कभू जाकी बारी,कभू बाकी बारी,