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Showing posts from June, 2021

सम्हर रई ऐ

ब्रज की दुनियां बतामें कौन कूं आखिर, कै हम पै का गुजर रई ऐ, बड़ी भारी विपत आई न कैसें ऊ सम्हर रई ऐ.. विवश बैठे ऐं अपने हाथ धरकें दोऊ घोंटुन पै, कबऊ तौ गैल निकरैगी,अबई तौ सब बिगर रई ऐ। डरप रौ ऐ जि तेरौ मांस तेरी अपनी दुनियां में, कहाँ ते हौसला लामें, कै जब नस नस बिखर रई ऐ। तपन सूरज की भारी ऐ, हमारे मूड़ पै साँईं, जे ऐसी भंक व्यापी ऐ कि सब दुनियां पजर रई ऐ। उर्मिला माधव