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Showing posts from August, 2021

रूठबे कौ डर

बिगर बरसात के रहबै, चमन के रूठबे कौ डर कहूँ जो ब्यार चल बाजी, घटन के रूठबे कौ डर खड़े हैं मोर्चा पै रात दिन सैनिक हमारे तईं, रहै हर दम करेजा में,वतन के रूठबे कौ डर जमाने भर की चिंता में बिगारैं काम सब अपने, ऑ जाऊ पै लगौ रहबै,सबन के रूठबे कौ डर कबऊ बेटा कौ मुंडन है,कबऊ है ब्याह लाली कौ, कहूँ नैकऊ कमी रह गई,बहन के रूठबे कौ डर, अजब दुनियां कौ ढर्रा ऐ,सम्हर केँ, सोच कें चलियोँ, तनिक भी चूक है गई तौ सजन के रूठबे कौ डर... उर्मिला माधव... 23.8.2016

निक सामरे बतइयो

ब्रिज की दुनियां  निक सामरे बतइयो, दुनिया में काम का है, अब तक लौं जी रहे हैं, जाकौ इनाम का है, कितनों बिगार होगौ, दुनियां में आदमी कौ, अइयो तनिक बतइयो, जे ताम झाम का है, चों बाबरौ बनाबै, कान्हा तू हम सबन कूँ, छलिया मरे जनम के, "अब" तेरौ नाम का है, सब ढूंढ़ते फिरें हैं, तोकूँ, गली गलिन में, तू आजकल कहाँ है, और तेरौ धाम का है, अब तू भी सुन लै कान्हा,टेरत रहंगे हमऊ, ठाड़े रहेंगे दिन भर, छइयां ऑ घाम का है, व्यभिचार बढ़ गयौ है, आनौं परैगौ तोकूँ,  तू भेस धरकें आजा, किसना ऑ राम का है, उर्मिला माधव

क़ता ब्रज में

फ़ालतू की राजनीति,काम की न काज की, बैठ केँ कपार धुनौ,.....दुसमन अनाज की, भारत की भित्तिन में,...सेंध लग गयी सुनौ, कैऊ साल है गईं ...जे बात है का आज की ? #उर्मिलामाधव.. 8.8.2015