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Showing posts from October, 2019

रीत निभावै

थोरे दिन कौ जीवन है तौ मन कूँ चों भरमावै, रह जागी यईं धरम संकला,सांस जबई रुक जावै, माई बाप और पुत्र पौत्र कूँ,कितनौउ लाड़ लड़ावै आँख मुंदी सोई भये बटाऊ,फिर कोउ लौट न पावै नित-नित र...

आधी ग़ज़ल

कैसी अब उम्मीद काऊ ते,कोई चों धीर बंधावै भयौ करेजा पथ्थर कौ, को अँखियन नीर बहावै, अपनौ रस्ता पांय हमारे,आपई चलनौ,पड़ै हमेस, चों फिर अपने मन के छाले गैरन कूँ दिखलावै, राम कसम जे द...