Skip to main content

Posts

Showing posts from March, 2020

मुस्किल ते

ब्रिज ग़ज़ल जिंदगी कट रही है मुस्किल ते, भागि जामेंगे, तेरी महफिल ते, सांस लैनौ भी एक जुआ सौ है, कैसें जीतेंगे काऊ आदिल ते, कितनी तक़लीफ़ है करेजा में, पूछ कें देखियों तौ बिस्मिल ते, नाव काग़ज़ की देह आफ़त सी, कितनी गहराई पूछें साहिल ते, हम कूं दूरी बताऔ मंजिल की, दूनी हिम्मत करिंगे हम दिल ते, उर्मिला माधव 28.3.2018

आवत है

बृजभाषा में एक पेशकश.... मइया मोकूँ रोज-रोज समझावत है, लौट फेर केँ बाई की सुधि आवत है, सबते छुपकें चढ़ केँ गई अटरिया पै, सइ संजा ते मन मेरौ घबरावत है, सब दुनियां के पीयु घरई में हैं आली, मेरौ मन बिरहा कौ राग अलापत है, कल्ल पड़ोसी बाबा मोते पूछ उठे, बे मतलब चौं आंसू रोज बहावत है, दूर देस में रहिबे बारे आजा अब, मौसम न्यारौ मोपै ताने मारत है, #उर्मिलामाधव.. 14.3.2016

घाव री

दामिनी दमकि केँ चमक मारै बावरी, भीतर ह्रदय के ....कुरेदै सब घाव री, अँखियाँ बहावें नीर,मनुआँ धरे न धीर, नित्य प्रति थोड़ो सो घटे बस चाव री... उर्मिला माधव, 9.3.2017

रार ई बे शुम्मार

मची है देखौ रार ई बे शुम्मार, गुंडा और ख़ूनिन ते अब तौ भरी दीख रई मंडी ऐ, भीतर भीतर आग लगी और झूठ कहें सब ठंडी ऐ, इतै-बितै चमचा सब डोलें डाल गले में अंडी ऐ, धोती कुर्ता पहन कें नाचें ता ऊपर इक बंडी ऐ, इतनौ त्रास मिलौ लोगन कूँ, हैगये सब बेजार, मची है देखौ..... लरिका बारे डरप रए सब आगें का का हौनी ऐ, सबरौ जीवन डरौ भयौ ऐ, कती सूत में पौनी ऐ, नीमन, बेजा समझ न आवै कैसी आँख मिचौनी ऐ, कोऊ न बतरामें आपस में जैसें दुनियां मौनी ऐ, भोले भाले मांसन पै ऊ है रये अत्याचार, मची ऐ देखौ रार ई बे शुम्मार, होरी ऐ वृषभान लली कोहराम मचौ ऐ धड़कन पै ललिता और बिसाखा डोलें, मारी-मारी सड़कन पै, नेंक नेंक है जाय करेजा अब बिजुरी की कड़कन पै, रात रात भर नींद न आवै चौबारे की खड़कन पै, जानें आंखें कहा देखलें, मैया अबकी बार, उर्मिला माधव

क़ता

कैसी झीनी चुनरिया..उढ़ाई सखी, तैने सबरी नगरिया...हंसाई सखी, रंग डारौ सबन्ने जो मिलि कें मोहे, खूब भीतर ही भीतर लजाई सखी.... उर्मिला माधव... 7.3.2014...