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Showing posts from June, 2022

अपने घर कूँ जाऔ जी

ब्रज की दुनियां फितरत कौ सामान समेटौ,अपने घर कूँ जाऔ जी, या फिर दुनियां की फितरत में अपनों राग मिलाऔ जी, भई वितृष्णा प्यार प्रीत ते,अपनी-अपनी दुनियां ऐ, भयौ हृदय पाषाण शिला सम ,कितनौऊ लाड़ लढ़ाऔ जी, गंगा,जमुना नदी हैं दोनों,दोउन कौ स्थान अलग, इन दोउन में भेद कहा है, जे मतलब समझाऔ जी, उर्मिला माधव