ब्रज की दुनियां फितरत कौ सामान समेटौ,अपने घर कूँ जाऔ जी, या फिर दुनियां की फितरत में अपनों राग मिलाऔ जी, भई वितृष्णा प्यार प्रीत ते,अपनी-अपनी दुनियां ऐ, भयौ हृदय पाषाण शिला सम ,कितनौऊ लाड़ लढ़ाऔ जी, गंगा,जमुना नदी हैं दोनों,दोउन कौ स्थान अलग, इन दोउन में भेद कहा है, जे मतलब समझाऔ जी, उर्मिला माधव