Skip to main content

अपने घर कूँ जाऔ जी

ब्रज की दुनियां

फितरत कौ सामान समेटौ,अपने घर कूँ जाऔ जी,
या फिर दुनियां की फितरत में अपनों राग मिलाऔ जी,

भई वितृष्णा प्यार प्रीत ते,अपनी-अपनी दुनियां ऐ,
भयौ हृदय पाषाण शिला सम ,कितनौऊ लाड़ लढ़ाऔ जी,

गंगा,जमुना नदी हैं दोनों,दोउन कौ स्थान अलग,
इन दोउन में भेद कहा है, जे मतलब समझाऔ जी,
उर्मिला माधव

Comments

Popular posts from this blog

मुस्कील ते

ब्रिज ग़ज़ल जिंदगी कट रही है मुस्किल ते, भागि जामेंगे, तेरी महफिल ते, सांस लैनौ भी एक जुआ सौ है, कैसें जीतेंगे काऊ आदिल ते, कितनी तक़लीफ़ है करेजा में, पूछ कें देखियों तौ बिस्मिल ते, नाव काग़ज़ की देह आफ़त सी, कितनी गहराई पूछें साहिल ते, हम कूं दूरी बताऔ मंजिल की, दूनी हिम्मत करिंगे हम दिल ते, उर्मिला माधव 28.3.2018

बबा जू

हकीकत बबा जू,समझनी परैगी, मजा की सजा तौ,भुगतनी परैगी, न बैय्यर की इज्जत है मिसरी कौ ढेला, जि गोली कुनैनी,गटकनी परैगी, घड़ी तुमनें बांधी है,सोने की मन भर, तौ लोहेउ की तुमकूँ पहरनी ...

कैसें आंकौ जायगौ

प्रेम कौ अनुपात आखिर कैसैं आंकौ जायगौ, यों बताऔ, मन के भीतर कैसैं झाँकौ जायगौ, पीर कौ अनुमान अब तक कौन कर पायौ कहौ, एक ही लठिया ते कैसे प्रेम हाँकौ जायगौ, आँख के आँसुंन ऐ तौ तुम हाथ ते ढकि लेओगे, घाव की दुनियां कौ हिस्सा कैसैं ढाँकौ जायगौ, जिंदगी भर राख चूल्हे की लगी रई हाथ में जे बताऔ और कब तक रेत फांकौ जायगौ, झालरी,झूमर सजा केँ, देह सुन्दर कर लई, कौन खन जे भाग मोतिन संग टांकौ जायगौ ? उर्मिला माधव.... 4.4.2016