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Showing posts from October, 2022

काज परौ

काज परौ तब मान धरौ, अब काज सरौ तौ का मान न देगौ ? जीउ हमारौ सियानों भयौ, अब तोकूँ उजग्गर जान न देगौ.. कितनी तरह के पहाड़े पढ़े, और छमता ते आगें बलैया लईं, अब घोड़ी चढ़ौ और दूल्हा बनौ, अब सबकी गुहार पै कान न देगौ.. उर्मिला माधव

इतने पइसा बारेन के जब

इतने पइसा बारेन के जब बालक भये मति हीन, माई - बाप के जान जिगर के टुकड़ा है गए तीन। आजादी कौ रस्ता पकरौ, करौ न कछू लिहाज, आग जराई, धुआं उड़ायौ, और भए तल्लीन। दुनियादारी टेढ़ी इतनी, कोउ न अपनौ होय, भलई मरौ या जरौ, रहौ तुम कितनेऊ गमगीन। भीतर-भीतर तारी पीटें, आंसू, पोंछें ख़ूब ठठ्ठा मार कें हँसै जमानों, चेहरा भयौ मलीन। बक-बक करवे बारेन की है हिम्मत कूं शाबाश छाती तान कें, मोंह के आगै सबरे कहैं कमीन उर्मिला माधव