इतने पइसा बारेन के जब बालक भये मति हीन,
माई - बाप के जान जिगर के टुकड़ा है गए तीन।
आजादी कौ रस्ता पकरौ, करौ न कछू लिहाज,
आग जराई, धुआं उड़ायौ, और भए तल्लीन।
दुनियादारी टेढ़ी इतनी, कोउ न अपनौ होय,
भलई मरौ या जरौ, रहौ तुम कितनेऊ गमगीन।
भीतर-भीतर तारी पीटें, आंसू, पोंछें ख़ूब
ठठ्ठा मार कें हँसै जमानों, चेहरा भयौ मलीन।
बक-बक करवे बारेन की है हिम्मत कूं शाबाश
छाती तान कें, मोंह के आगै सबरे कहैं कमीन
उर्मिला माधव
Comments
Post a Comment