जिंदगी कट रही है मुस्किल ते, भागि जामेंगे, तेरी महफिल ते, सांस लैनौ भी एक जुआ सौ है, हम न जीतेंगे काऊ आदिल ते, कितनी तक़लीफ़ है करेजा में, पूछ कें देखियों तौ बिस्मिल ते, नाव काग़ज़ की ...
बृजभाषा में एक पेशकश.... मइया मोकूँ रोज-रोज समझावत है, लौट फेर केँ बाई की सुधि आवत है, सबते छुपकें चढ़ केँ गई अटरिया पै, सइ संजा ते मन मेरौ घबरावत है, सब दुनियां के पीयु घरई में हैं आ...
महिला दिवस इन बातन में कछु नाय धरौ,इक दिन कूँ नारि करी ऊंची, बाहिर में नारे ख़ूब लगे,पर भीतर लाय धरी,दूंची, दिन रात तौ घर के काम करै, पर ता की गिनती कौन करै, हां इतनी किरपा जरूर करी,...