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Showing posts from August, 2018

नहीं तुमकूँ हमारी

नहीं तुमकूं हमारी इक अना के रूठबे कौ डर, हमें भी चों रहैगौ, जा के,बा के रूठबे कौ डर, अबई तक गैर की खातिर मरौ ऐ कौन दुनियां में, कहाँ आँखन में अब बाक़ी हया के रूठबे कौ डर ? बड़ी मछली ते ब...

बबा जू

हकीकत बबा जू,समझनी परैगी, मजा की सजा तौ,भुगतनी परैगी, न बैय्यर की इज्जत है मिसरी कौ ढेला, जि गोली कुनैनी,गटकनी परैगी, घड़ी तुमनें बांधी है,सोने की मन भर, तौ लोहेउ की तुमकूँ पहरनी ...

रूठबे कौ डर

बिगर बरसात के रहबै, चमन के रूठबे कौ डर कहूँ जो ब्यार चल बाजी, घटन के रूठबे कौ डर वतन के मोर्चा पै रात दिन ठाड़े रहें सैनिक रहै हर दम करेजा में,वतन के रूठबे कौ डर जमाने भर की चिंता म...

हारी भई

ब्रिज ग़ज़ल ... जब मेरी ज़िन्दगी मोपे भारी भई, तब शरण मैं बिहारी तिहारी भई, दुनियां बारेन्ने समझी बिचारी हूँ मैं, घर ते बाहिर ते बिलकुल निकारी भई, जानि केँ मैंने छोड़ी धरम संकला सब स...

काम की न काज की

फ़ालतू की राजनीति,काम की न काज की, बैठ केँ कपार धुनौ,.....दुसमन अनाज की, भारत की भित्तिन में,...सेंध लग गयी सुनौ, कैऊ साल है गईं ...जे बात है का आज की ? उर्मिला माधव.. 8.8.2015

कोऊ न होगौ---ग़ज़ल

मित्रता दिवस कूँ समर्पित--- संग-संग जो डोल रहे ऐं भीर परी तौ, कोऊ न होगौ, हम ऐसे अनमोल रहे ऐं, हमन सरीखौ,कोऊ न होगौ जब-जब बिपत परी मित्रन पै, ठाड़े रहे बराबर ते हम, हमें भौत जो तोल रहे ऐ...