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नहीं तुमकूँ हमारी

नहीं तुमकूं हमारी इक अना के रूठबे कौ डर,
हमें भी चों रहैगौ, जा के,बा के रूठबे कौ डर,

अबई तक गैर की खातिर मरौ ऐ कौन दुनियां में,
कहाँ आँखन में अब बाक़ी हया के रूठबे कौ डर ?

बड़ी मछली ते बोलौ कब बची है,नैक सी मछली ?
न है काऊ के दिल में अब ख़ुदा के रूठबे कौ डर ?

जिन्हें अपनी खबर नाएँ, बतामें, गैल औरन कूँ
कहाँ बच्चन कूं अब माता-पिता के रूठबे कौ डर,

तू भैया ऐ, मैं बहना ऊँ,जि अम्मा ऐं, बो दादा ऐं,
जि का जनिंगे का होतो,चचा के रूठबे कौ डर ?
उर्मिला माधव..
27.8.2016

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मुस्कील ते

ब्रिज ग़ज़ल जिंदगी कट रही है मुस्किल ते, भागि जामेंगे, तेरी महफिल ते, सांस लैनौ भी एक जुआ सौ है, कैसें जीतेंगे काऊ आदिल ते, कितनी तक़लीफ़ है करेजा में, पूछ कें देखियों तौ बिस्मिल ते, नाव काग़ज़ की देह आफ़त सी, कितनी गहराई पूछें साहिल ते, हम कूं दूरी बताऔ मंजिल की, दूनी हिम्मत करिंगे हम दिल ते, उर्मिला माधव 28.3.2018

अपनों आप बनानौं होगौ

ब्रज की दुनियां अपनों आप बनानों होगौ, बा के बाद जमानों होगौ.. मार पीट ते, चों डरपौगे, आगें हाथ बढ़ानों होगौ। चलनों हो जो संग सबई के झूठौ लाड़ लड़ानों होगौ। इक ढर्रा पै नांय चलैगी, नक्सा नयौ बनानों होगौ.. नाम उजागर करवे काजें, गहरौ रंग लगानों होगौ। खूब बना लै महल अटरिया, सांस रुकी तौ जानों होगौ। जग में जितने स्वांग रचे हैं, सबकौ मोल चुकानों होगौ।। उर्मिला माधव

प्रीत की रीत निभावै

थोरे दिन कौ जीवन है तौ मन कूँ मत भरमावै, रह जागी यईं धरम संकला,सांस जबई रुक जावै, माई बाप और पुत्र पौत्र कूँ,कितनौउ लाड़ लड़ावै आँख मुंदी सोई भये बटाऊ,फिर कोउ लौट न पावै नित-नित रार करै दुनियां में,ज़र,जोरू की खातिर, बढ़िया हो जो हर काऊ ते,प्रीत की रीत निभावै, उर्मिला माधव.. 24.10.2016