फ़ालतू की राजनीति,काम की न काज की,
बैठ केँ कपार धुनौ,.....दुसमन अनाज की,
भारत की भित्तिन में,...सेंध लग गयी सुनौ,
कैऊ साल है गईं ...जे बात है का आज की ?
उर्मिला माधव..
8.8.2015
ब्रिज ग़ज़ल जिंदगी कट रही है मुस्किल ते, भागि जामेंगे, तेरी महफिल ते, सांस लैनौ भी एक जुआ सौ है, कैसें जीतेंगे काऊ आदिल ते, कितनी तक़लीफ़ है करेजा में, पूछ कें देखियों तौ बिस्मिल ते, नाव काग़ज़ की देह आफ़त सी, कितनी गहराई पूछें साहिल ते, हम कूं दूरी बताऔ मंजिल की, दूनी हिम्मत करिंगे हम दिल ते, उर्मिला माधव 28.3.2018
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