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Showing posts from September, 2020

बिन्दावन में

मन मयूर के पंख टूटि कें, बिखर गए बिन्दावन में, इतै-बितै हम मारे फिर रए बिना बात अब कानन में, धर्म भृष्ट सब साधु कहामें, प्रतिक्षण भ्रष्टाचार बढ़ें, परमारथ की को सोचै, जब स्वार्थ समायौ बातन में, स्वर्ण महल की करें कल्पना, मात-पिता दुत्कार दए, शिला पूजि कें हर्षित है गए, कहा धरौ है पाहन में, दीप्ति विनय की भई उपेक्षित, गर्व भरे हुंकार बचे, निराकरण होवैगौ कैसें, शस्त्र गहें जब हाथन में, नवल,पुरातन,जन्म मृत्यु सब एक ठौर पै निहित रहें, व्याप्त है महिमा सकल विश्व की बस कान्हा के आनन में, उर्मिला माधव, 19.9.2018

रुपइये नईं ऐं

रातों रात नोट बंदी और अपने पास मात्र 50 रुपए, और तिहाड़ जेल का मुशायरा, जो महसूस हुआ--/ कोई अपना, भैये नईं ऐं, अपने पास रुपइये नईं ऐं, कैसी दुनियादारी भइया, जो गाड़ी में पहिये नईं ऎं, धोका धड़ी से बढ़िया ये है, प्यार नहीं,तौ कहिये,नईं ऎं, अपनी भी तौ अना है आख़िर, हम को कुछ भी, चइये नईं ऎं, उर्मिला माधव.. 19.11.2016

इकले इकले चल रए ऐं

ब्रज की दुनियां हम इकले-इकले चल रए ऐं, ऑ सब प्रानिन कूं खल रए ऐं, अब चाल हमारी कैसीउ हो, पर घर ते रोज निकल रए ऐं, हम अपनौ मान उतारें चों, जब लोगऊ ख़ूब बदल रए हैं, अब जबर कौ पल्लू भारी ऐ, सब रोजई आग उगल रए ऐं भई बिनके जी की बे जानें, जो भीतर ख़ूब उबल रए ऐं, उर्मिला माधव