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इकले इकले चल रए ऐं

ब्रज की दुनियां

हम इकले-इकले चल रए ऐं,
ऑ सब प्रानिन कूं खल रए ऐं,

अब चाल हमारी कैसीउ हो,
पर घर ते रोज निकल रए ऐं,

हम अपनौ मान उतारें चों,
जब लोगऊ ख़ूब बदल रए हैं,

अब जबर कौ पल्लू भारी ऐ,
सब रोजई आग उगल रए ऐं

भई बिनके जी की बे जानें,
जो भीतर ख़ूब उबल रए ऐं,
उर्मिला माधव

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