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Showing posts from July, 2024

निकर रहे हैं

हमारौ जी अब भयौ वित्रिश्नित  अबई तौ जी में सम्हर रहे हैं, हमारे जी की हमें खबर है, कै जग हंसाई ते डर रहे हैं, विद्याधर प्रह्लाद के सूरज,  हजार लंग ते निकर रहे हैं,

बाबरौ इनसान

कौनसी बातन पै इतरायौ भयौ ऐ, बाबरौ इनसान भरमायौ भयौ ऐ, हांऊं-फाऊं कर रह्यौ ऐ चार लंग कूँ, झूठ की दुनियां पै बौरायौ भयौ ऐ होस में आजा,मरै मत लोभ ते रे, जोरिवे कौ भूत चों छायौ भयौ है, एक खन में सांस जे रुक जाएगी, सत्य कौ परमान बिसरायौ भयौ ऐ, याद कर संतन की बानी, भूलगौ का ? सूर कौ, कबिरा कौ सब गायौ भयौ ऐ.. जाँ पै राजी आवै ताँ पै देख लै जा, गुनि जनन हैं ज्ञान दरसायौ भयौ ऐ, उर्मिला माधव..

गिरदाब को

हमने देखा ही नहीं था वक़्त के गिरदाब को, बंद करना पड़ गया जब हर ख़ुशी के बाब को, सब अधूरा छोड़कर हम सोचते रहते थे बस, कौन पूरा कर सका है ज़िंदगी के ख़ाब को, उर्मिला माधव

रात भर

खूब बिजुरी कड़कती रही रात भर, मैं अकेली डरपती रही रात भर, मेह की जे लगै अब गिरौ, तब गिरौ जी पै सिल सी सरकती रही रात भर, रात कैसें कटी का कहूँ अब सखी, जिउ की देहल दरकती रही रात भर, ऐसौ लगतौ रह्यौ कोऊ आवेगौ अब, जी में साँकर खटकती रही रात भर, बस अँधेरौ घिरौ ही रह्यौ का कहूँ, एक बदली बरसती रही रात भर.. उर्मिला माधव

नाच न जानें , आंगन टेढ़ौ ।।

मती करौ तुम तेरौ मेरौ, हिया सरम की कछू तौ हेरौ, दुनिया वारे सदा एक से, बिनकी माऊं नजर मत फेरौ चेत जाऔ सब अबई बखत है, मूड़ पै बादर घिरौ घनेरौ, मन की बात उजग्गर कहि दई, भीतर ते सब मेल कढ़ेरौ, भाज ठड़ौ हो,सबन ते बच कें, काउ कूँ इतनों भी मत घेरौ, सब प्राणिन में कमी निकारै, नाच न जानें आंगन टेधौ उर्मिला माधव