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रात भर

खूब बिजुरी कड़कती रही रात भर,
मैं अकेली डरपती रही रात भर,

मेह की जे लगै अब गिरौ, तब गिरौ
जी पै सिल सी सरकती रही रात भर,

रात कैसें कटी का कहूँ अब सखी,
जिउ की देहल दरकती रही रात भर,

ऐसौ लगतौ रह्यौ कोऊ आवेगौ अब,
जी में साँकर खटकती रही रात भर,

बस अँधेरौ घिरौ ही रह्यौ का कहूँ,
एक बदली बरसती रही रात भर..
उर्मिला माधव

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मुस्कील ते

ब्रिज ग़ज़ल जिंदगी कट रही है मुस्किल ते, भागि जामेंगे, तेरी महफिल ते, सांस लैनौ भी एक जुआ सौ है, कैसें जीतेंगे काऊ आदिल ते, कितनी तक़लीफ़ है करेजा में, पूछ कें देखियों तौ बिस्मिल ते, नाव काग़ज़ की देह आफ़त सी, कितनी गहराई पूछें साहिल ते, हम कूं दूरी बताऔ मंजिल की, दूनी हिम्मत करिंगे हम दिल ते, उर्मिला माधव 28.3.2018

अपनों आप बनानौं होगौ

ब्रज की दुनियां अपनों आप बनानों होगौ, बा के बाद जमानों होगौ.. मार पीट ते, चों डरपौगे, आगें हाथ बढ़ानों होगौ। चलनों हो जो संग सबई के झूठौ लाड़ लड़ानों होगौ। इक ढर्रा पै नांय चलैगी, नक्सा नयौ बनानों होगौ.. नाम उजागर करवे काजें, गहरौ रंग लगानों होगौ। खूब बना लै महल अटरिया, सांस रुकी तौ जानों होगौ। जग में जितने स्वांग रचे हैं, सबकौ मोल चुकानों होगौ।। उर्मिला माधव

प्रीत की रीत निभावै

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