खूब बिजुरी कड़कती रही रात भर,
मैं अकेली डरपती रही रात भर,
मेह की जे लगै अब गिरौ, तब गिरौ
जी पै सिल सी सरकती रही रात भर,
रात कैसें कटी का कहूँ अब सखी,
जिउ की देहल दरकती रही रात भर,
ऐसौ लगतौ रह्यौ कोऊ आवेगौ अब,
जी में साँकर खटकती रही रात भर,
बस अँधेरौ घिरौ ही रह्यौ का कहूँ,
एक बदली बरसती रही रात भर..
उर्मिला माधव
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