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Showing posts from August, 2024

चमन के रूठवे कौ डर

बिगर बरसात के रहबै, चमन के रूठबे कौ डर कहूँ जो ब्यार चल बाजी, घटन के रूठबे कौ डर खड़े हैं मोर्चा पै रात दिन सैनिक हमारे तईं, रहै हर दम करेजा में,वतन के रूठबे कौ डर जमाने भर की चिंता में बिगारैं काम सब अपने, ऑ जाऊ पै लगौ रहबै,सबन के रूठबे कौ डर कबऊ बेटा कौ मुंडन है,कबऊ है ब्याह लाली कौ, कहूँ नैकऊ कमी रह गई,बहन के रूठबे कौ डर, अजब दुनियां कौ ढर्रा ऐ,सम्हर केँ, सोच कें चलियोँ, तनिक भी चूक है गई तौ सजन के रूठबे कौ डर... उर्मिला माधव... 23.8.2016

जाकौ इनाम का है

ब्रिज की दुनियां  निक सामरे बतइयो, दुनिया में काम का है, अब तक लौं जी रहे हैं, जाकौ इनाम का है, कितनों बिगार होगौ, दुनियां में आदमी कौ, अइयो तनिक बतइयो, जे ताम झाम का है, चों बाबरौ बनाबै, कान्हा तू हम सबन कूँ, छलिया मरे जनम के, "अब" तेरौ नाम का है, सब ढूंढ़ते फिरें हैं, तोकूँ, गली गलिन में, तू आजकल कहाँ है, और तेरौ धाम का है, अब तू भी सुन लै कान्हा,टेरत रहंगे हमऊ, ठाड़े रहेंगे दिन भर, छइयां ऑ घाम का है, व्यभिचार बढ़ गयौ है, आनौं परैगौ तोकूँ,  तू भेस धरकें आजा, किसना ऑ राम का है, उर्मिला माधव

दुनिया रोज़ बिड़ारी है

ब्रज की दुनियां सब की सब दुनियां की कारगुजारी है हमनें जेई दुनियां रोज बिड़ारी है, रोज उठै उत्पात बिना ही मतलब कौ, अपने घर की रोजई बात बिगारी है, कैसें अपने घर कौ द्वार बचाऔगे सबनें मिलकें घर की भीत उखारी है, अबकें ही दुनियां कौ ढर्रा समझौ है, सोच समझि कें घर की आब उतारी है, जाकूँ देखौ, झोली लै कें डोल रह्यौ, जाकी देखौ ताकी मत, मतवारी है, दूर ते देखें खूब तमासौ दुनियां कौ खूब समझ कें इक तरकीब निकारी है.. उर्मिला माधव

विनेश फोगाट

बेमतलब कूँ दियौ बिड़ार, हम में इतनों है गयौ भार? मात पिता की आसा टूटी, जी पै है गयौ अत्याचार, टूंक टूंक है गयौ करेजा, कुल जीवन कौ कियौ बिगार, रखियो किसना लाज हमारी, संकट ते अब तूई उबार, कैसें समझामें हम खुद कूँ, मचौ है जी में हाहाकार, भीतर भीतर तोय पुकारूं, अबकें सुन लै ओ करतार.. उर्मिला माधव