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कब तक इतनौ भाजैगौ

ब्रज की दुनिया कब तक इतनों भाजैगौ? आखिर तौ रुक जावैगौ. आपा धापी मती करै, तौ फिर बुध्धू बाजैगौ।। स्याउ-स्याउ मोंह देखे की, कोउ न मान बढ़ावैगौ.. बारी फुलवारी कूँ देख, काम गैर नईं आवैगौ.. आंख मिली तौ वा जी वा, पीठ फिरी डकरावैगौ.. डरपा-डरपी, बे-मतलब, लाज समरिया राखैगौ.. उर्मिला माधव

होड़ मची सिंहासन की

ब्रज के रंग दुनियां में जब होड़ मची सिंहासन की, हमकूँ फिकिर लगी है चौका बासन की, जब जी चाहे, बैठौ, मन में राम भजौ चाहत का करनी है कुस के आसन की. सब ते पहलें उठ कें घर के काम करौ, याद सम्हारौ मन में विघ्न बिनासन की, जब जोरन ते हवा चली ढह जानों सब, दुनियां खालिस महल बनी है तासन की.. याद करौ बिन देस के बीर जवानन की, युद्ध करौ और रोटी खाई घासन की.. उर्मिला माधव

आपनें अपनों सम्हारौ आप बस

ब्रज की दुनियां आपनें अपनों सम्हारौ आप बस, और सबकूं दै दियौ संताप बस, आपा पूती कर दई बौहार में, जाना मानी में कियौ है पाप बस, जी हमारौ खूब दूखौ है प्रभू हमई ए जो ना दियौ है साप बस, हमपै जब बर्दाश्त हरगिज ना भई तब हमारे जी कूँ चढ़गौ ताप बस, हम गुहारें राम कूँ वो कब सुनै, मन ई मन में कर रहे हैं जाप बस,

प्रीत की रीत निभावै

थोरे दिन कौ जीवन है तौ मन कूँ मत भरमावै, रह जागी यईं धरम संकला,सांस जबई रुक जावै, माई बाप और पुत्र पौत्र कूँ,कितनौउ लाड़ लड़ावै आँख मुंदी सोई भये बटाऊ,फिर कोउ लौट न पावै नित-नित रार करै दुनियां में,ज़र,जोरू की खातिर, बढ़िया हो जो हर काऊ ते,प्रीत की रीत निभावै, उर्मिला माधव.. 24.10.2016

स्वांग

ब्रज की दुनियां बेमतलब कौ स्वांग रचानों पड़ रौ है, सब इम्लिन कूं आम बतानों पड़ रौ है... इज्जत वारेन की तौ लुटिया डूब रही, अपनों कद और मान घटानों पड़ रौ है सब दुनियां के ढोंग समझ कें बैठे हैं, दुनियां भर कूं नाम बतानों पड़ रौ है.. नैकउ रस्ता नांय बचौ अब चलिबे कूं सब रस्तन के बीच जमानों पड़ रौ है.. और अपोजीसन कितनों है पावैगौ भ्र्ष्टाचार ते ध्यान हटानों पड़ रौ है... दैया चिल्ली भारी मच रई लोगन में, अपने घर कूं लौट कें जानों पड़ रौ है.. उर्मिला माधव

अपनों आप बनानौं होगौ

ब्रज की दुनियां अपनों आप बनानों होगौ, बा के बाद जमानों होगौ.. मार पीट ते, चों डरपौगे, आगें हाथ बढ़ानों होगौ। चलनों हो जो संग सबई के झूठौ लाड़ लड़ानों होगौ। इक ढर्रा पै नांय चलैगी, नक्सा नयौ बनानों होगौ.. नाम उजागर करवे काजें, गहरौ रंग लगानों होगौ। खूब बना लै महल अटरिया, सांस रुकी तौ जानों होगौ। जग में जितने स्वांग रचे हैं, सबकौ मोल चुकानों होगौ।। उर्मिला माधव