ब्रज की दुनिया
कब तक इतनों भाजैगौ?
आखिर तौ रुक जावैगौ.
आपा धापी मती करै,
तौ फिर बुध्धू बाजैगौ।।
स्याउ-स्याउ मोंह देखे की,
कोउ न मान बढ़ावैगौ..
बारी फुलवारी कूँ देख,
काम गैर नईं आवैगौ..
आंख मिली तौ वा जी वा,
पीठ फिरी डकरावैगौ..
डरपा-डरपी, बे-मतलब,
लाज समरिया राखैगौ..
उर्मिला माधव
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