ग़ज़ल.....
मैं तुमें समसान तक लै जाउंगी,
सच तुमें आँखिन ते मैं दिखवाउंगी,
मैं तुमें समसान तक लै जाउंगी,
सच तुमें आँखिन ते मैं दिखवाउंगी,
ऐसी सच्चाई लिखी है राख पै,
खुद पढौगे मैं कहा पढ़वाउंगी,
खुद पढौगे मैं कहा पढ़वाउंगी,
श्याम मुख हों या कि हों कर्पूर मुख,
जे ई सबकौ अंत है समझाउंगी,
जे ई सबकौ अंत है समझाउंगी,
देह मुर्दा,आग में जर जायगी
कष्ट काया कौ कहाँ कह पाउंगी,
कष्ट काया कौ कहाँ कह पाउंगी,
यईं धरे रह जांगे, घर और जमीन,
सच कहूँ तौ काहे पै इतराउंगी,
उर्मिला माधव,
15.4.2016
सच कहूँ तौ काहे पै इतराउंगी,
उर्मिला माधव,
15.4.2016
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