बृजभाषा में एक पेशकश....
मइया मोकूँ रोज-रोज समझावत है,
लौट फेर केँ बाई की सुधि आवत है,
सबते छुपकें चढ़ केँ गई अटरिया पै,
सइ संजा ते मन मेरौ घबरावत है,
सब दुनियां के पीयु घरई में हैं आली,
मेरौ मन बिरहा कौ राग अलापत है,
कल्ल पड़ोसी बाबा मोते पूछ उठे,
बे मतलब चौं आंसू रोज बहावत है,
दूर देस में रहिबे बारे आजा अब,
मौसम न्यारौ मोपै ताने मारत है,
#उर्मिलामाधव..
14.3.2016
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