दामिनी दमकि केँ चमक मारै बावरी,
भीतर ह्रदय के ....कुरेदै सब घाव री,
अँखियाँ बहावें नीर,मनुआँ धरे न धीर,
नित्य प्रति थोड़ो सो घटे बस चाव री...
उर्मिला माधव,
9.3.2017
ब्रिज ग़ज़ल जिंदगी कट रही है मुस्किल ते, भागि जामेंगे, तेरी महफिल ते, सांस लैनौ भी एक जुआ सौ है, कैसें जीतेंगे काऊ आदिल ते, कितनी तक़लीफ़ है करेजा में, पूछ कें देखियों तौ बिस्मिल ते, नाव काग़ज़ की देह आफ़त सी, कितनी गहराई पूछें साहिल ते, हम कूं दूरी बताऔ मंजिल की, दूनी हिम्मत करिंगे हम दिल ते, उर्मिला माधव 28.3.2018
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