न घर ई हमारौ न दुनियां हमारी,
पतौ जे चलौ कै हमईं ए भिकारी,
इमारत तौ अब लौं धरी जों की तों ऐं,
कै सांसई अचानक चली गई बिचारी,
हबाके भरे जिन्ने दुनियां में ऊंचे,
बेऊ मर कैं कित्ते भये भारी-भारी,
जि निश्चित है सब कूँ ई मरनौ पडैगौ,
कभू जाकी बारी,कभू बाकी बारी,
जो कहनी ई हमकूं,सो कह दीनी हमनै
तौ मानौ न मानौ है राजी तुम्हारी,
सबै छोड़ जानौ है दुनियां कौ मेला,
डरी यईं रहेंगी महलिया अटारी...
उर्मिला माधव....
11.5.2016...
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