ब्रिज ग़ज़ल
जब मेरी ज़िन्दगी मोपे भारी भई,
तब शरण मैं बिहारी तिहारी भई,
दुनियां बारेन्ने समझी बिचारी हूँ मैं,
घर ते बाहिर ते बिलकुल निकारी भई,
जानि केँ मैंने छोड़ी धरम संकला
सब समझबे लगे मोकूँ हारी भई,
कैसे कैसे प्रपंचन ते पालौ पड़ौ,
सबनै समझी मती मेरी मारी भई
जाऊं बलिहारी तोपै जसोदा कुमर,
कैसें समझूँ मैं बिलकुल भिखारी भई,
उर्मिला माधव..
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