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रूठबे कौ डर

बिगर बरसात के रहबै, चमन के रूठबे कौ डर
कहूँ जो ब्यार चल बाजी, घटन के रूठबे कौ डर

खड़े हैं मोर्चा पै रात दिन सैनिक हमारे लैं,
रहै हर दम करेजा में, वतन के रूठबे कौ डर

जमाने भर की चिंता में बिगारैं काम सब अपने,
तौऊ जापै लगौ रहबै, सबन के रूठबे कौ डर

कबऊ बेटा कौ मुंडन है,कबऊ है ब्याह लाली कौ,
कहूँ नैकऊ कमी रै गई,बहन के रूठबे कौ डर,

अजब दुनियां कौ ढर्रा ऐ,सम्हर केँ, सोच कें चलियोँ,
तनिक भी चूक है गई तौ सजन के रूठबे कौ डर...
उर्मिला माधव

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