नहीं तुमकूं हमारी इक अना के रूठबे कौ डर,
हमें भी चों रहैगौ, जा के,बा के रूठबे कौ डर,
अबई तक गैर की खातिर मरौ ऐ कौन दुनियां में,
कहाँ आँखन में अब बाक़ी हया के रूठबे कौ डर ?
बड़ी मछली ते बोलौ कब बची है,नैक सी मछली ?
न है काऊ के दिल में अब ख़ुदा के रूठबे कौ डर ?
जिन्हें अपनी खबर नाएँ, बतामें, गैल औरन कूँ
कहाँ बच्चन कूं अब माता-पिता के रूठबे कौ डर,
तू भैया ऐ, मैं बहना ऊँ,जि अम्मा ऐं, बो दादा ऐं,
जि का जनिंगे का होतो,चचा के रूठबे कौ डर ?
उर्मिला माधव..
27.8.2016
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