मन मयूर के पंख टूटि कें, बिखर गए बिन्दावन में,
इतै-बितै हम मारे फिर रए बिना बात अब कानन में,
धर्म भृष्ट सब साधु कहामें, प्रतिक्षण भ्रष्टाचार बढ़ें,
परमारथ की चों सोचें जब स्वार्थ समायौ बातन में,
स्वर्ण महल की करें कल्पना, मात-पिता दुत्कार दए,
शिला पूजि कें हर्षित है गए, कहा धरौ है पाहन में,
दीप्ति विनय की भई उपेक्षित, गर्व भरे हुंकार बचे,
निराकरण होवैगौ कैसें, शस्त्र गहें जब हाथन में,
नवल,पुरातन,जन्म मृत्यु सब एक ठौर पै निहित रहें,
व्याप्त है महिमा सकल विश्व की बस कान्हा के आनन में,
उर्मिला माधव,
19.9.2018
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