ब्रज की दुनियां
जमानों रोज रुठैगौ, कहाँ तक तुम मनाऔगे,
भरोसौ रोज मागैंगे, कसम का रोज खाऔगे?
अगर जो गैल चलनी ऐ, फिकिर चों और की करनी,
जिही तौ गैल सबकी ऐ, कहां फिर बच कें जाऔगे ?
जि दुनियां इतनी ओछी है, भितरिया वार कर देगी
जहां कोऊ न अपनों है, कितै दुख लेकें जाऔगे?
उर्मिला माधव
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