सूरज कैसौ कारौ-कारौ लग रौ ऐ,
जाई कारन जग अँधियारौ लग रौ ऐ।
थर थर थर थर कांप रहे ऐं घर भीतर,
दुनियां कौ हर मांस बिचारौ लग रौ ऐ।
एक पड़ोसी हम ते बोलौ, पागल हौ?
हमकूँ तौ सब जग उजियारौ लग रौ ऐ।
भीतर-भीतर खूब चबउआ है रए ऐं,
बाहिर बाहिर ख़ूब सम्हारौ लग रौ ऐ।
नीमन बेजा अबई समझ नईं आवैगी,
अबई तमाचौ बड़ौ करारौ लग रौ ऐ।
उर्मिला माधव
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