ब्रज की दुनियां
बतामें कौन कूं आखिर, कै हम पै का गुजर रई ऐ,
बड़ी भारी विपत आई न कैसेउँ अब सम्हर रई ऐ..
विवश बैठे ऐं अपने हाथ धरकें दोऊ घोंटुन पै,
कबऊ तौ गैल निकरैगी,अबई तौ सब बिगर रई ऐ।
डरप रौ ऐ जि तेरौ मांस तेरी अपनी दुनियां में,
कहाँ ते हौसला लामें, कै जब नस नस बिखर रई ऐ।
तपन सूरज की भारी ऐ, हमारे मूड़ पै साँईं,
जे ऐसी भंक व्यापी ऐ कि सब दुनियां पजर रई ऐ।
उर्मिला माधव
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