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का गुजर रई ऐ

ब्रज की दुनियां

बतामें कौन कूं आखिर, कै हम पै का गुजर रई ऐ,
बड़ी भारी विपत आई न कैसेउँ अब सम्हर रई ऐ..

विवश बैठे ऐं अपने हाथ धरकें दोऊ घोंटुन पै,
कबऊ तौ गैल निकरैगी,अबई तौ सब बिगर रई ऐ।

डरप रौ ऐ जि तेरौ मांस तेरी अपनी दुनियां में,
कहाँ ते हौसला लामें, कै जब नस नस बिखर रई ऐ।

तपन सूरज की भारी ऐ, हमारे मूड़ पै साँईं,
जे ऐसी भंक व्यापी ऐ कि सब दुनियां पजर रई ऐ।
उर्मिला माधव

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मुस्कील ते

ब्रिज ग़ज़ल जिंदगी कट रही है मुस्किल ते, भागि जामेंगे, तेरी महफिल ते, सांस लैनौ भी एक जुआ सौ है, कैसें जीतेंगे काऊ आदिल ते, कितनी तक़लीफ़ है करेजा में, पूछ कें देखियों तौ बिस्मिल ते, नाव काग़ज़ की देह आफ़त सी, कितनी गहराई पूछें साहिल ते, हम कूं दूरी बताऔ मंजिल की, दूनी हिम्मत करिंगे हम दिल ते, उर्मिला माधव 28.3.2018

अपनों आप बनानौं होगौ

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प्रीत की रीत निभावै

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