Skip to main content

बिन्दाबन में

मन मयूर के पंख टूटि कें, बिखर गए बिन्दावन में,
इतै-बितै हम मारे फिर रए बिना बात अब कानन में,

धर्म भृष्ट सब साधु कहामें, प्रतिक्षण भ्रष्टाचार बढ़ें,
परमारथ की को सोचै, जब स्वार्थ समायौ बातन में,

स्वर्ण महल की करें कल्पना, मात-पिता दुत्कार दए,
शिला पूजि कें हर्षित है गए, कहा धरौ है पाहन में,

दीप्ति विनय की भई उपेक्षित, गर्व भरे हुंकार बचे,
निराकरण होवैगौ कैसें, शस्त्र गहें जब हाथन में,

नवल,पुरातन,जन्म मृत्यु सब एक ठौर पै निहित रहें,
व्याप्त है महिमा सकल विश्व की बस कान्हा के आनन में,
उर्मिला माधव,
19.9.2018

Comments

Popular posts from this blog

मुस्कील ते

ब्रिज ग़ज़ल जिंदगी कट रही है मुस्किल ते, भागि जामेंगे, तेरी महफिल ते, सांस लैनौ भी एक जुआ सौ है, कैसें जीतेंगे काऊ आदिल ते, कितनी तक़लीफ़ है करेजा में, पूछ कें देखियों तौ बिस्मिल ते, नाव काग़ज़ की देह आफ़त सी, कितनी गहराई पूछें साहिल ते, हम कूं दूरी बताऔ मंजिल की, दूनी हिम्मत करिंगे हम दिल ते, उर्मिला माधव 28.3.2018

अपनों आप बनानौं होगौ

ब्रज की दुनियां अपनों आप बनानों होगौ, बा के बाद जमानों होगौ.. मार पीट ते, चों डरपौगे, आगें हाथ बढ़ानों होगौ। चलनों हो जो संग सबई के झूठौ लाड़ लड़ानों होगौ। इक ढर्रा पै नांय चलैगी, नक्सा नयौ बनानों होगौ.. नाम उजागर करवे काजें, गहरौ रंग लगानों होगौ। खूब बना लै महल अटरिया, सांस रुकी तौ जानों होगौ। जग में जितने स्वांग रचे हैं, सबकौ मोल चुकानों होगौ।। उर्मिला माधव

प्रीत की रीत निभावै

थोरे दिन कौ जीवन है तौ मन कूँ मत भरमावै, रह जागी यईं धरम संकला,सांस जबई रुक जावै, माई बाप और पुत्र पौत्र कूँ,कितनौउ लाड़ लड़ावै आँख मुंदी सोई भये बटाऊ,फिर कोउ लौट न पावै नित-नित रार करै दुनियां में,ज़र,जोरू की खातिर, बढ़िया हो जो हर काऊ ते,प्रीत की रीत निभावै, उर्मिला माधव.. 24.10.2016