ब्रज की दुनियां
देखियो अब और कित्ते दिन बचे हैं,
मेरे संग संग और कै साकिन बचे हैं?
झूठ कौ झगड़ौ जबर ते का मिटैगौ,
इक सपेरा, नाग और नागिन बचे हैं..
चैन की का सांस अब आवैगी हमकूँ?
जब अबई जे दुख्ख तौ अनगिन बचे हैं..
को मुकद्दर कौ लिखौ अब मैट देगौ?
जिंदगी में जेई दो पल छिन बचे हैं
उर्मिला माधव
साकिन---अचल
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