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रामदुलारे गैया कौनें मारी है

ब्रज की दुनियां

एक सवेरौ सौ रातन पै भारी है,
राम दुलारे, गैया कौनें मारी है?

भैंसा, बकरा, और मुरगन की बात अलग,
इनके मरिबे की तौ महिमा न्यारी है,

राम लला रे अब दुनियां कौ का होगौ?
योंई समझ रये बिगरी बात सम्हारी है

चिमटा की आवाज पै गैया आय गई,
घर आई तब गैया रोज बिड़ारी है

रोज बहाने चैयें बिनकूँ लडिबे कूँ,
अब कें लरिकन नें तलवार निकारी है..

मैं बलिहारी अपनेइ बंसी वारे की,
तीनों लोक ते अबऊ मथुरा न्यारी है.
उर्मिला माधव

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ब्रिज ग़ज़ल जिंदगी कट रही है मुस्किल ते, भागि जामेंगे, तेरी महफिल ते, सांस लैनौ भी एक जुआ सौ है, कैसें जीतेंगे काऊ आदिल ते, कितनी तक़लीफ़ है करेजा में, पूछ कें देखियों तौ बिस्मिल ते, नाव काग़ज़ की देह आफ़त सी, कितनी गहराई पूछें साहिल ते, हम कूं दूरी बताऔ मंजिल की, दूनी हिम्मत करिंगे हम दिल ते, उर्मिला माधव 28.3.2018

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