ब्रज माधुरी
को कितनों भुगतैगौ जामें करम समझनों बाकी है,
ऊंच नीच कूँ का समझैगौ धरम समझनों बाकी है
जो खुद कूँ मर्मज्ञ जान कें ज्ञान बांट रए दुनिया में,
ऐसे सब पंडित ज्ञानिन कूँ, मरम समझनों बाकी है,
इतै बितै इठलइयाँ मारें, इतर छिड़क कें कपड़न पै
अपनी अपनी काया कूँ, जब चरम समझनों बाकी है,
बेहा बनिकें जीभ चलामें आँखिन सों अंगार गिरें
गारी दैवे वारेन कूं भी सरम समझनों बाकी है
उर्मिला माधव
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