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समझनों बाक़ी है

ब्रज माधुरी
को कितनों भुगतैगौ जामें करम समझनों बाकी है,
ऊंच नीच कूँ का समझैगौ धरम समझनों बाकी है

जो खुद कूँ मर्मज्ञ जान कें ज्ञान बांट रए दुनिया में,
ऐसे सब पंडित ज्ञानिन कूँ, मरम समझनों बाकी है,

इतै बितै इठलइयाँ मारें, इतर छिड़क कें कपड़न पै
अपनी अपनी काया कूँ, जब चरम समझनों बाकी है,

बेहा बनिकें जीभ चलामें आँखिन सों अंगार गिरें
गारी दैवे वारेन कूं भी सरम समझनों बाकी है
उर्मिला माधव

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ब्रिज ग़ज़ल जिंदगी कट रही है मुस्किल ते, भागि जामेंगे, तेरी महफिल ते, सांस लैनौ भी एक जुआ सौ है, कैसें जीतेंगे काऊ आदिल ते, कितनी तक़लीफ़ है करेजा में, पूछ कें देखियों तौ बिस्मिल ते, नाव काग़ज़ की देह आफ़त सी, कितनी गहराई पूछें साहिल ते, हम कूं दूरी बताऔ मंजिल की, दूनी हिम्मत करिंगे हम दिल ते, उर्मिला माधव 28.3.2018

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