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Showing posts from June, 2026

सुनिश्चित है

ब्रज की दुनियां❤️❤️ अति में ऑ ईश्वर में बैर सुनिश्चित है, काई पै फ़िसलंगे पैर सुनिश्चित है, साँच कभू मत कहियो, दुनियां कूटैगी, पत्थर की मूरत कूं दैर सुनिश्चित है.. गर्व कियौ रावण नें, लंका मैट दई, करनी तौ भुगतैगौ खैर सुनिश्चित है, धरी पाप की मूड़ गठरिया,होस में आ नरक कुंड की वरना ,सैर सुनिश्चित है, उर्मिला माधव,

हम पै का गुजर रई है

ब्रज की दुनियां बतामें कौन कूं आखिर, कै हम पै का गुजर रई ऐ, बड़ी भारी विपत आई न कैसेउँ अब सम्हर रई ऐ.. विवश बैठे ऐं अपने हाथ धरकें दोऊ घोंटुन पै, कबऊ तौ गैल निकरैगी,अबई तौ सब बिगर रई ऐ। डरप रौ ऐ जि तेरौ मांस तेरी अपनी दुनियां में, कहाँ ते हौसला लामें, कै जब नस नस बिखर रई ऐ। तपन सूरज की भारी ऐ, हमारे मूड़ पै साँईं, जे ऐसी भंक व्यापी ऐ कि सब दुनियां पजर रई ऐ। उर्मिला माधव

जमानों कितनों बिगरि गयौ है

जमानों कितनों बिगरि गयौ ऐ, कै ख़ुद कूँ कितनों सम्हारै कोई, अजब-अजब से हैं माँस जग में,करेजा कितनों पजारै कोई, जिन्हें पजरिबे कौ शौक है बे,बिना ही मतलब पजर रये हैं, लिखौ ऐ जिनके करम में जरिबौ तौ बिन कूँ कितनों बिडारै कोई, जे जिंदगानी है जामें भैया,हजार घटना लिखी भई ऐं, कै धीर धरनों परैगौ आखिर, तौ बोलौ कितनों,चिंघारै कोई? तुम अपने ग़म कूँ,जमाने भर में,अनहोंतौ जैसौ समझ रये हौ, सबई कौ खेला है एक जैसौ,तौ बोलौ कितनों पुकारै कोई, है कल्ल ही की सी बात हमनें कही कें इतनों न रोऔ भइया, समझनों ही जब कोई न चाहै ,तौ कैसें, कितनों सुधारै कोई, उर्मिला माधव, 2.6.2017