जमानों कितनों बिगरि गयौ ऐ, कै ख़ुद कूँ कितनों सम्हारै कोई,
अजब-अजब से हैं माँस जग में,करेजा कितनों पजारै कोई,
जिन्हें पजरिबे कौ शौक है बे,बिना ही मतलब पजर रये हैं,
लिखौ ऐ जिनके करम में जरिबौ तौ बिन कूँ कितनों बिडारै कोई,
जे जिंदगानी है जामें भैया,हजार घटना लिखी भई ऐं,
कै धीर धरनों परैगौ आखिर, तौ बोलौ कितनों,चिंघारै कोई?
तुम अपने ग़म कूँ,जमाने भर में,अनहोंतौ जैसौ समझ रये हौ,
सबई कौ खेला है एक जैसौ,तौ बोलौ कितनों पुकारै कोई,
है कल्ल ही की सी बात हमनें कही कें इतनों न रोऔ भइया,
समझनों ही जब कोई न चाहै ,तौ कैसें, कितनों सुधारै कोई,
उर्मिला माधव,
2.6.2017
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