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Showing posts from October, 2021

स्वांग रचानों पड़ रौ है

ब्रज की दुनियां बेमतलब कौ स्वांग रचानों पड़ रौ है, सब इम्लिन कूं आम बतानों पड़ रौ है... इज्जत वारेन की तौ लुटिया डूब रही, अपनों कद और मान घटानों पड़ रौ है सब दुनियां के ढोंग समझ कें बैठे हैं, दुनियां भर कूं नाम बतानों पड़ रौ है.. नैकउ रस्ता बचौ कहाँ अब चलिबे कूं सब रस्तन के बीच जमानों पड़ रौ है.. और अपोजीसन कितनों है पावैगौ भ्र्ष्टाचार ते ध्यान हटानों पड़ रौ है... दैया चिल्ली भारी मच गई लोगन में, अपने घर कूं लौट कें जानों पड़ रौ है.. उर्मिला माधव

धरम संकला

ब्रिज माधुरी  थोरे दिन कौ जीवन है तौ मन कूँ चों भरमावै, रह जागी यईं धरम संकला,सांस जबई रुक जावै, माई बाप और पुत्र पौत्र कूँ,कितनौउ लाड़ लड़ावै आँख मुंदी सोई भये बटाऊ,फिर कोउ लौट न पावै नित-नित रार करै दुनियां में,ज़र,जोरू की खातिर, बढ़िया हो जो हर काऊ ते,प्रीत की रीत निभावै, उर्मिला माधव

टुकड़ा है गए तीन

इतने पइसा बारेन के जब बालक भये मति हीन, माई - बाप के जान जिगर के टुकड़ा है गए तीन। आजादी कौ रस्ता पकरौ, करौ न कछू लिहाज, आग जराई, धुआं उड़ायौ, और भए तल्लीन। दुनियादारी टेढ़ी इतनी, कोउ न अपनौ होय, भलई मरौ या जरौ, रहौ तुम कितनेऊ गमगीन। भीतर-भीतर तारी पीटें, आंसू, पोंछें ख़ूब ठठ्ठा मार कें हँसै जमानों, चेहरा भयौ मलीन। बक-बक करवे बारेन की है हिम्मत कूं शाबाश छाती तान कें, मोंह के आगै सबरे कहैं कमीन उर्मिला माधव

अपनों आप

अपनों आप बनानों होगौ, बा के बाद जमानों होगौ.. मार पीट ते, चों डरपौगे, आगें हाथ बढ़ानों होगौ। चलनों हो जो संग सबई के झूठौ लाड़ लड़ानों होगौ। इक ढर्रा पै नांय चलैगी, नक्सा रोज बनानों होगौ.. नाम उजागर करवे काजें, गहरौ रंग लगानों होगौ। उर्मिला माधव

लाहौर वाले

याद तुमको कर रही हूँ, अय मियां लाहौर वाले, आज तक भी सब खड़े हैं, दरमियां लाहौर वाले, तुमने लानत भेज दी जब ज़िन्दग़ी को हार कर, अब भला किस काम की ये अदवियां लाहौर वाले, अब न तुम ही हो न कोई भी महकती शाम है, खोल दें या बंद रख्खें, खिड़कियां लाहौर वाले

जबर की चली है

निबल कौ कहाँ कोऊ दुनियां में साथी, लगैगी कै जैसें जबर की चली है, मगर तू हमारी ऊ सुन लीजो लाला, हकीकत में आखिर सबर की फली है उर्मिला माधव

दैर सुनिश्चित है

ब्रज की दुनियां❤️❤️ Uma Sharma अति में ऑ ईश्वर में बैर सुनिश्चित है, काई पै फ़िसलंगे पैर सुनिश्चित है, साँच कभू मत कहियो, दुनियां कूटैगी, पत्थर की मूरत कूं दैर सुनिश्चित है.. गर्व कियौ रावण नें, लंका मैट दई, करनी तौ भुगतैगौ खैर सुनिश्चित है, धरी पाप की मूड़ गठरिया,होस में आ नरक कुंड की वरना ,सैर सुनिश्चित है, उर्मिला माधव,

ऊधम

दुनियां भर कौ नास कर दियौ,दुनियां के रखवारेन ने, औरन कूँ बदनाम कर दियौ,ऊधम करवे वारेन ने.... उर्मिला माधव...

सूरज कैसौ कारौ

सूरज कैसौ कारौ-कारौ लग रौ ऐ, जाई कारन जग अँधियारौ लग रौ ऐ। थर थर थर थर कांप रहे ऐं घर भीतर, दुनियां कौ हर मांस बिचारौ लग रौ ऐ। एक पड़ोसी हम ते बोलौ, पागल हौ? हमकूँ तौ सब जग उजियारौ लग रौ ऐ। भीतर-भीतर खूब चबउआ  है रए ऐं, बाहिर बाहिर ख़ूब सम्हारौ लग रौ ऐ। नीमन बेजा अबई समझ नईं आवैगी, अबई तमाचौ बड़ौ करारौ लग रौ ऐ। उर्मिला माधव

ओछी हरकत

ओछी हरक़त भारी कर दई बिननें तौ, अपनेई घर की थारी भर दई बिननें तौ, जीभ ते बस ईमान दिखामें दुनियां कूँ, मूड़न पे बेगारी धर दई बिननें तौ, बीच गैल में पत्थर धर कें चल दीन्हे, रस्तन कूँ लाचारी कर दई बिननें तौ, अपनी आप बड़ाई कर कें नाच रहे, बे-मतलब बीमारी कर दई बिननें तौ, इक दूजे कौ ताज सम्हारें फिर रए ऐं, सब दुनियां की ख्वारी कर दई बिननें तौ, उर्मिला माधव

ऐसे ऐसे दिना मत दिखावै प्रभू

ब्रज की दुनियां ऐसे-ऐसे दिना मत दिखावै प्रभू, चों तू मूरख समझ कें डरावै प्रभू, मोकूं भारी परै जि धरम संकला, खोटी दुनियां निरन्तर सतावै प्रभू, पापी दुष्टात्मा नर्क गामी अधम, ऐसौ-ऐसौ डरप कें दिखावै प्रभू, रात दिन कोस रस्ता के गिनतौ रहै, द्वार तक तेरे चलकें न आवै प्रभू कोऊ बिपदा परै तो मेरी जीभ पै, कृश्न मोहन मुरारी ही आवै प्रभू, मैंने हर गैल इकली चली रामजी, ना तौ पूछी न कोऊ बतावै प्रभू, तैनें कितनी लई हैं परीक्षा मेरी, मोपै नैकउ बनावट न आवै प्रभू, सिर्फ़ कोशिश जि है, राह चलती रहूं, चाहै कुछ भी न आवै न जावै प्रभू, उर्मिला माधव

नैक न सोची कान्हा

नैक न सोची कान्हा, बच्चा बिलखंगे?? प्रभू सबन के मात-पितन कूं लै लंगे ? तुम कूं को पूछैगौ ऐसे जुल्मन पै, जब दुनियां में लरिका वारे उठ लंगे.. याद तुमऊं कूं नानी अपनी आवैगी, जब सबके व्यौहार तुमईं ते बदलेंगे.. बूढ़े, बालक कोऊ न छोड़ौ दुनियां में? हम तौ अपनी आप तसल्ली कर लंगे.. बड़ौ करेजा पत्थर कौ कर राखौ ऐ, बिन दुनियां के प्रान तुम्हारेउ भटकंगे.. उर्मिला माधव

छल करवे वारेन की दुनियां

ब्रज की दुनियां छल करवे वारेन की दुनियां औंधी ऐ, जग भर की आँखिन में खास रतौंधी ऐ। कितनों जुलम सहौ धरती की माटी नें, आसमान में बिजुरी जब जब कौंधी ऐ।। ता ऊपर फिर घटा बरस कें रोअन लगी, पर धरती की खुशबू कितनी सौंधी ऐ।। उर्मिला माधव

का गुजर रई ऐ

ब्रज की दुनियां बतामें कौन कूं आखिर, कै हम पै का गुजर रई ऐ, बड़ी भारी विपत आई न कैसेउँ अब सम्हर रई ऐ.. विवश बैठे ऐं अपने हाथ धरकें दोऊ घोंटुन पै, कबऊ तौ गैल निकरैगी,अबई तौ सब बिगर रई ऐ। डरप रौ ऐ जि तेरौ मांस तेरी अपनी दुनियां में, कहाँ ते हौसला लामें, कै जब नस नस बिखर रई ऐ। तपन सूरज की भारी ऐ, हमारे मूड़ पै साँईं, जे ऐसी भंक व्यापी ऐ कि सब दुनियां पजर रई ऐ। उर्मिला माधव

पक्षधर बुलाने होंय

ब्रज की दुनियां Manglesh Dutt Chaturvedi  तुमें जो अपने कछू पक्षधर बुलाने होंय, महा पै जाऔ जहां मोतबर ठिकाने होंय। बिगर बजाएं कोऊ रंग तौ जमैगौ नहीं, हमें बतइयों अगर साजगर बुलाने होंय। बुलइयों हमकूँ तुमें आकें हम बतामेंगे, हवा बिगर भी अगर, पालघर चलाने होंय। हमीर राग पै, पटदीप ना जुरैगो कबउ, बजइयों ढोल जबई ताल पर बजाने होंय। अकेले घर में कहा दीप तुम जराऔगे, जरइयों दीप जबई चार घर सजाने होंय। उर्मिला माधव

जमानों रोज रुठैगौ

ब्रज की दुनियां जमानों रोज रुठैगौ, कहाँ तक तुम मनाऔगे, भरोसौ रोज मागैंगे, कसम का रोज खाऔगे? अगर जो गैल चलनी ऐ, फिकिर चों और की करनी, जिही तौ गैल सबकी ऐ, कहां फिर बच कें जाऔगे ? जि दुनियां इतनी ओछी है, भितरिया वार कर देगी जहां कोऊ न अपनों है, कितै दुख लेकें जाऔगे? उर्मिला माधव

खर्चा नईं भावै

ब्रज की दुनियां सेंत मेंत में प्रेम भाव कौ खर्चा नईं भावै बापू जी मोकूं, चरचा नईं भावै, भंक व्याप रई दुनियां में अब कोउ न पूछन हार, खंड खंड भारत करिवे कूं खड़ी करें दीवार, कहा कहें हम वृथा प्रेम कौ खर्चा नईं भावै, बापू जी मोकूं चर्चा नईं भावै भूकन मरें गरीब कहूं कंहुँ, दौलत अपरमपार, कहा बतामें तुमकूं कितनों व्यापक भ्रष्टाचार, जाई बात सूं प्रेम भाव कौ खर्चा नईं भावै बापू जी मोकूं चरचा नईं भावै, उर्मिला माधव 2.10.2019